कविता - आज हम बेगाने हो गये 

यह कविता दिल को छूने वाली है, जो रिश्तों के बीच की दूरी और बदलाव को बहुत गहरे तरीके से व्यक्त करती है। डॉ. बिन्देश्वर प्रसाद गुप्ता ने बहुत ही भावनात्मक और सच्चाई से परिपूर्ण शब्दों में यह कविता लिखी है। इसमें बेगानी होती जा रही भावनाओं और रिश्तों के उलझाव को व्यक्त किया गया है, जो जीवन में कभी-कभी हम अनुभव करते हैं।


आज हम बेगाने हो गये
आज हम बेगाने हो गये 

चेहरे उनके कहने लगे , हम अनजाने हो गये । 

अपने ही,इसी घर में,आज हम बेगाने हो गये ।। 


उठना-चलना,पढ़ना- लिखना, सिखाया मैंने जिन्हें। 

कहने लगे आज वे,हम आपसे सयाने हो गये ।। 


बोलिये मत , रास नहीं आती , मुझे आपकी बातें । 

देखिये , गोद में खेले , कैसे मनमाने हो गये ।। 


अपनी जिंदगी के हसीं वक्त जिन पर लुटाये मैंने । 

छोड़ मुझे वे ही , किसी और के दीवाने हो गये।। 


भाई ! बस ,धोखे ही प्यार की जगह खाये मैंने । 

दुनिया के सारे दर्द मेरे आशियाने हो गये ।। 


-- डा.बिन्देश्वर प्रसाद गुप्ता पटना, (बिहार)


कविता का हर शेर, एक गहरी संवेदना को उजागर करता है, जैसे अपनों से दूर हो जाना, उनके बदलते हुए व्यवहार को देखना और अपने ही बनाए रिश्तों में धोखे का सामना करना। यह कुछ ऐसे एहसास हैं जिनसे शायद हम सब कभी न कभी गुजरते हैं।

यह कविता रिश्तों के बीच आई दूरी और दिल की बेबसी को बयान करती है, और अगर इसे विस्तार से लिखा जाए, तो हम इसे इस रूप में देख सकते हैं:

हम बेगाने हो गये 2.0

फिर वही चेहरे, वही आवाजें,

मगर अब कुछ बदला सा महसूस होता है।

वही लोग, जो कभी अपने थे,

अब अनजाने, जैसे क्यूँ लगता है ।


अपनी ही ज़िंदगी के साये में,

आज हम खुद को पराया सा महसूस करते हैं,

अपने घर में ही, हम बेगाने हो गये।

कभी एक साथ हम हंसते थे, खेलते थे,

उनके बिना दिन की शुरुआत नहीं होती थी,

जिन्हें मैंने सीखा दिया था जीने का तरीका,

वो अब कहने लगे हैं, "हम आपसे सयाने हो गए "


वे अपनी राह पर चले गए,

मेरे रास्तों को छोड़, अपना रास्ता खुद चुन लिया।

जिन्हें मैंने अपना वक्त और प्यार दिया,

वे अब बिना किसी पछतावे के,

किसी और की ओर बढ़ गए,

और मैं अकेला, वहीं खड़ा हो गया


याद है, कैसे उनकी हंसी ने घर को रोशन किया था?

अब वो ही हंसी मुझे ताने लगती है,

अब न कोई बात दिल को छूती है,

न उनकी मासूमियत में कोई मिठास।

अब तो उनके शब्द भी, जैसे बर्फ से ठंडे हो गए हैं,

मेरी गोदी में खेलते हुए, वे अब मनमाने हो गए


जब जरूरत थी किसी का साथ,

जब चाहत थी किसी का प्यार,

मैंने उन्हें पूरी तरह से अपना लिया था,

मगर आज वही लोग,

जिन्हें मैंने अपनी ज़िन्दगी का हिस्सा माना,

वो किसी और के दीवाने हो गए


दिल की आवाज़, मन का दर्द,

अब क्या बयां करूं, क्या कहूं?

धोखा ही तो मिला, सच्चे प्यार की जगह,

मैंने ही तो खुद को खो दिया,

अब मेरा आशियाना दर्द से भरा है,

वो दुनिया, जो कभी मेरे लिए एक थी,

अब हर आह और हर घड़ी में,

मेरे भीतर का अकेलापन मुझे चुपचाप पड़ा है

-- हरिशंकर कुमार (शिक्षक)