लोकतंत्र - डॉ स्वाराक्षी स्वारा

लोकतंत्र - डॉ स्वाराक्षी स्वारा
लोकतंत्र - डॉ स्वाराक्षी स्वारा 



लोकतंत्र :

पैसों का यह खेल है सारा,
निर्बल का न कोई सहारा,
बातें कागज पर छपती रहतीं,
न कोई करता, न कोई कहता,
पैसा गरज-गरज कर कहता,
"जुल्म सहो! चुपचाप रहो!"
धन हीं जीवन का मूल मंत्र है,
सब कहते हैं लोकतंत्र है।

भ्रष्टाचार गगन को चूम रहे,
हत्यारे खुलेआम घूम रहे,
न्याय का तंत्र बिक चुका है,
अधिकारों का गला घोंट चुका है,
पैसा बोलता है, आवाज़ें दबतीं,
न्याय भी अब एक व्यापार बनता,
सब कहते हैं लोकतंत्र है।

धर्म, जाति, लिंग की बातों में,
सच्चाई खो जाती है रातों में,
राहों में बिछाए जाते हैं जाल,
किसे मिलेगा, कौन करेगा हाल?
सपने दिखाए जाते हैं हर चुनाव,
पर हर सवाल का मिलता नहीं जवाब,
सब कहते हैं लोकतंत्र है।

गरीब तो भूखा, सड़कों पे सोए,
महंगाई के आँचल में डूबे,
स्वास्थ्य, शिक्षा हो गई महंगी,
रोज़मर्रा की जरूरतें भी हैं तंगी,
स्वच्छता और विकास का ख्वाब दिखाया,
पर जनता को सिर्फ धोखा खिलाया,
सब कहते हैं लोकतंत्र है।

सत्ता के खेल में सच्चाई है खोई,
जिन्हें चाहिए था समर्थन, वही ठोकी,
ग़रीबों के हक में काले बादल घिरे,
नौकरशाहों की झूठी हंसी गूंजे,
पर असलियत में डर फैला है हर दिशा में,
लोकतंत्र की आवाज़ भी दबे है कहीं,
सब कहते हैं लोकतंत्र है।

शब्दों का अर्थ बदल चुका है अब,
जनता का हक सब भूल चुके हैं कब,
समाज की हर कड़ी में टूटन है आई,
विवेक का ज्ञान अब खोने पर आई,
पैसा ही अब है वोट, न्याय और सत्ता,
लोकतंत्र क्या, यह तो केवल बुत है।

बदलाव की यह लहर उठानी होगी,
समानता, स्वतंत्रता का परचम लहरानी होगी,
न्याय, अधिकार, मानवता की पुनः खोज करनी होगी,
तभी सही अर्थ में लोकतंत्र को पुनः खोज पायेंगे।

☝✍ डॉ स्वरक्षी स्वारा

सब कहते हैं लोकतंत्र है...

यह संस्करण लेखिका के मूल विचार को और गहरे तरीके से प्रस्तुत करता है, जहां लोकतंत्र की खामियां, भ्रष्टाचार और असमानताएं और भी उजागर होती हैं, साथ ही बदलाव की आवश्यकता पर भी जोर दिया गया है। लेखिका ने बहुत ही मार्मिक और प्रभावशाली तरीके से लोकतंत्र के भ्रष्ट और विकृत रूप को चित्रित किया है। यह कविता हमारे समाज की सच्चाई को उजागर करती है, जहां पैसों का प्रभुत्व, भ्रष्टाचार, और अन्याय का बोलबाला है। "लोकतंत्र" शब्द अब एक खोखले ढांचे के रूप में दिख रहा है, जिसमें गरीब और कमजोर वर्ग की कोई आवाज़ नहीं है।

समाज में हो रही इन समस्याओं के प्रति आपकी चिंता साफ तौर पर नजर आती है, और यह सवाल उठाती है कि आखिर लोकतंत्र के असली उद्देश्य क्या हैं। क्या यह बस सत्ता के लिए खेल बन गया है, या फिर इसे एक सशक्त और न्यायपूर्ण व्यवस्था के रूप में पुनः स्थापित करने की जरूरत है?

आपकी कविता समाज को जागरूक करने के लिए एक प्रेरणा का काम कर सकती है।



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