गजल: रोना आया

 
गजल: रोना आया
गजल: रोना आया 

गजल : रोना आया !

गुल पे, गुलशन पे, न गुलफ़ाम पे रोना आया, 

बिन तेरे गुज़री जो उस शाम पे रोना आया। 

अश्क़ आँखों में नहीं आए सज़ा पे,

लेकिन सर पे झूठे लगे इलज़ाम पे रोना आया । 

सौदेबाजी में जहां सारा लगा है,

इसके जग में इंसान  के घटे दाम पे रोना आया । 

जिसको होंठों से तेरे सुन के ख़ुशी मिलती थी हिज़्र में अपने, 

उसी नाम पे रोना आया। 

हम समझ लेंगे ज़माने की हवा बदली है,

ख़ास लोगों को अगर आम पे रोना आया। 

बाद मरने के जो दुनिया ने दिया है,

हीरा उस दिखावे भरे इकराम पे रोना आया। 

✍  हीरालाल यादव हीरा


बहुत खुशी हुई कि आपको विस्तार पसंद आया! 
अब और कुछ शेर जोड़ते हैं, ताकि ग़ज़ल की गहराई और बढ़े और हर शेर में भावनाओं का और विस्तार हो सके:


वो सूरत जो कभी आई थी नज़र से मिलकर,

अब उस तस्वीर की धुंधली सी याद पे रोना आया।

समझा था कि हम सच्चे हैं, वो हमारे साथ होंगे,

अब उनके छिपे हुए धोखे के सलाम पे रोना आया।

दिल की वीरानियों में जो रंग थे कभी, वो अब फीके हैं,

उस खोये हुए उजाले के नाम पे रोना आया।

जब हर कदम पर अजनबी थे वो चेहरे,

अपने रिश्तों के टूटे हुए धागे पे रोना आया।

सवाल अब यही है, कहां वो सच का सूरज,

इस तारे के झूठे उगने के इल्ज़ाम पे रोना आया।

जिसे चाहा था दिल से, वो हाथ कभी न मिला,

अब उस अधूरी उम्मीद के नाम पे रोना आया।

हर ग़म को छुपा के, वो मुस्कान बनी थी आईने,

अब वो टूटे हुए चेहरे के ग़म में रोना आया।

तुझसे बिछड़कर हर रास्ते की राह पे रोना आया,

ज़िंदगी के हर मुकाम पे, हर अंजाम पे रोना आया। 

दूरियाँ बढ़ी हैं सारा जहाँ लगा है बेगाना,

दुआओं में हर किसी के नाम पे रोना आया। 

रातों को चाँद से पूछा क्यों वो भी चुप सा रहता है,

उसकी खामोशी की इस शाम पे रोना आया। 

जो वादा था साथ चलने का, वो खो गया किसी मोड़ पे,

अब तो हर घड़ी उस दिन के ख्वाब पे रोना आया। 

सपने थे, जो टूटकर बिखर गए, तो इस राह में,

हर पल उसी ख्वाब के अंजाम पे रोना आया। 

इंसानियत की तक़दीर पर हो जैसे गहरा ग़म,

हमारे समाज के इन्साफ़ के नाम पे रोना आया। 

हमें पता था, कोई नहीं था साथ रहने वाला,

फिर भी उस उम्मीद के कमज़ोर धागे पे रोना आया। 

✍  हरिशंकर कुमार (शिक्षक)

यह विस्तार ग़ज़ल के मूल भाव को बनाए रखता है, जिसमें इंसान की नाउम्मीदी, समाज की बेरुखी, और प्रेम की हानि को महसूस किया गया है। इन शेरों के ज़रिए हम यह दिखाते हैं कि कैसे व्यक्ति अपनी उम्मीदों, रिश्तों और समाज के बीच दर्द और पीड़ा को महसूस करता है।

आपको यह विस्तार कैसा लगा?

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