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| नदिया न जाने ( नवगीत ) - बहुत गहरा और भावनात्मक |
नदिया न जाने ( नवगीत )
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नदिया न जाने
किसको बहाये
किसको डूबाये
यह हँसी बिखेरती रौशनी
चमक रही नीली - नीली
न जाने किसको डूबाये
तुम्हारी ये आँखें सपनीली
गंगा का पवित्र किनारा
ये चेहरा चाँद सा प्यारा
फूल सा खिला तन - यौवन
परिमल बिखेरता निश्छल मन तुम्हारा
स्वप्न गुंथता जंगल
गंध में डूबी यामिनी
महक से बहक रहा मन
फिर खंडित होगी तपस्या
तुम मेनका कामिनी
नियति न जानता कोई
माया जाल में फँस रही सभी दिशाएँ
न जाने कौन किनारा लगे
न जाने कौन डूब जाए ।
✍ डॉ. अभिषेक कुमार
यह भवनात्मक और दार्शनिक दृष्टिकोण को और गहराई से समझने की कोशिश करता हूँ। कुछ और पंक्तियाँ जोड़कर इसे बढ़ा सकता हूँ, तो कविता कुछ इस तरह है। कविता जीवन के कई आयामों को छूने वाली है, और मेरा मानना है कि इसे विस्तार से व्यक्त किया जा सकता है।
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| नदिया न जाने ( नवगीत ) - बहुत गहरा और भावनात्मक |
नदिया के बहाव में,
कभी चंचल कभी शांत,
न जाने कितनी तन्हाईयों को गले लगाती चली जाती है।
कभी बर्फीली राहों में,
तो कभी गर्मी के तपते रेगिस्तान में,
मनुष्य की तरह बहती नदिया,
कभी खुद को खो देती है,
तो कभी नये किनारे खोज लेती है।
तुम्हारी आँखों में जो सपने हैं,
वो पल-पल बदलते हैं,
जैसे रात्रि की चाँदनी में,
एक तारा कभी बुझता,
तो कभी नया चमकता है।
तुम्हारी मुस्कान में बसी यह नदिया,
कभी सुख का प्रतीक बनती है,
तो कभी गहरे दर्द का अहसास,
जो खामोशी में डूब जाता है।
जीवन के इस अनमोल सफर में,
कभी एक नया मोड़ आता है,
नदी की धारा की तरह,
कभी निराश, कभी उम्मीद से भरा।
तुम जैसे ही सागर के किनारे,
एक नई काव्य रचना बन जाते हो,
और हम न जाने कब, कहाँ, इस जाल में उलझकर डूब जाते हैं।
यह नदिया, यह जीवन,
और तुम, सब कुछ अनंत है,
अनजाना है, न कोई जानता है इसका अंत,
न कोई जानता है इसके भीतर का सच।
✍ हरिशंकर कुमार (शिक्षक)
यह नवगीत बहुत गहरा और भावनात्मक है। डॉ. अभिषेक कुमार ने इस कविता के माध्यम से जीवन की अनिश्चितताओं और प्रेम की रहस्यमयता को बहुत सुंदर तरीके से व्यक्त किया है। नदिया के बहाव की तरह जीवन भी हमें अज्ञात स्थानों पर ले जाता है, और यह सोच कि किसे यह रौशनी या डूबान का सामना करना होगा, एक विचारशील पहलू है।
कविता में गंगा के पवित्र किनारे से लेकर मेनका की छवि तक, एक प्रतीकात्मकता और गहरी भावनाओं का खेल है। ये पंक्तियाँ यह भी दर्शाती हैं कि जीवन के मार्ग पर कौन सा मोड़ कब आएगा, इसका कुछ भी पूर्वानुमान नहीं किया जा सकता।
आपको यह कविता कैसी लगी?
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