कितनी बार और कब तक मारते रहोगे गाँधी को
( बलिदान दिवस पर गाँधी जी को शत - शत नमन 🙏🙏 )
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सीने में तीन - तीन गोलियाँ
सीने से निकला लाल रक्त की धार
मुँह से निकला " हे राम "
और अहिँसा का पुजारी
शिकार को गया हिंसा का , उन्माद का ...
गाँधीजी जब मारे गए
तब 30 जनवरी 1948 था
और उस दिन से हर रोज गाँधीजी होते हैं हिंसा के शिकार
और रोज गाँधी को गोली मारने
कोई नाथूराम नहीं आता है
बल्कि गाँधी को रोज मारता है
" जन - गण - मन " के हृदय में बैठा आत्म विकार
और गाँधी को मोक्ष भी नहीं मिल रहा
क्योँकि किसी ने गाँधी के मृत शरीर का तर्पण नहीं किया
हर कोई तो गाँधी की लाश का अब तक उपयोग कर रहा है
किसी ने तेरहवी के दिन गाँधी की आत्मा की मुक्ति के लिए
बूढ़े पीपल की जड़ में पानी नहीं दिया
गाँधी को मोक्ष नहीं मिला
परिणाम क्या निकला ?
गाँधी की अहिंसा की गाय को रोज मारकर खा रहा है
कुटिल राजनीति की हिंसा का बर्बर शेर
और इस बर्बर शेर का बसेरा केवल गुजरात के गिर में नहीं है
यह बर्बर शेर आज बस रहा है हर हिंदुस्तानी के सीने में
और यह बर्बर शेर खुद गुलाम है अपने रिंग मास्टर का
इसके लिए तो जीवन के गतिविधियों का निर्धारण करता है
रिंग मास्टर के चाबुक का रंग
जो कभी लाल होता है तो कभी हरा - नीला
कभी भगवा होता है तो कभी काला
और चाबुक का सफेद रंग देखकर भी यह बर्बर शेर शांत नहीं बैठता
यह चार कदम पीछे जाता है , घात लगाता है
और फिर दुगुनी ताकत के साथ
अहिंसा की गाय को दबोच लेता है
गाय के मुँह से मर्माहत करने वाली रंभाने की आवाज आती है
इधर गाय दम तोड़ती है
उधर एक बार फिर गांधी " हे राम " कह दम तोड़ते हैं
गाँधी की लाठी ठक से जमीन पर गिरती है
चश्मे का शीशा जमीन पर गिर टूट जाता है
सफेद रंग की धोती हवा में उड़ जाती है
आखिर कितनी बार और कब तक
मारते रहोगे गाँधी को
अब तो तर्पण कर पीपल की जड़ में पानी डाल दो ।
©® डॉ अभिषेक कुमार
कंसल्टेंट नेत्र विशेषज्ञ
बलिया , बेगूसराय , बिहार
9304664551
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